जिस राहु की दशा से सम्पूर्ण भारत बचता है, यहां उसी राहु की पूजा की जाती है। सुनने में थोड़ा अजीब है मगर ये सच है। भारत का इकलौता मंदिर है राहु पैठाणी मंदिर, जिसे राहु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। आज हम जानेंगे इसी मंदिर के बारे में। नमस्कार दगड़ियों, मैं नलिनी गोसाईं, उत्तराखंड की नौनी, स्वागत करती हूं आप सभी का अपने इस खास कार्यक्रम ‘देवताओं थै नमन’ में। तो चलिए जानते हैं राहु पैठाणी मंदिर के बारे में। राहु पैठणी मंदिर, उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के पैठाणी गाँव में स्थित एक अनोखा मंदिर है। यह मंदिर राहु को समर्पित है, जो हिन्दू पौराणिक कथाओं में एक ग्रह माने जाते हैं। राहु की दशा से प्रभावित होने पर ज्योतिषीय दृष्टि से इसे एक अशुभ ग्रह माना जाता है, लेकिन यहां पर राहु की पूजा विशेष रूप से की जाती है। यह भारत का इकलौता मंदिर है जहां राहु की पूजा होती है और भगवान शिव के साथ उन्हें भी पूजा जाता है। यह मंदिर स्योलिगाड और नवालिका नदियों के संगम पर स्थित है, जिसे राठ क्षेत्र भी कहा जाता है। स्थानीय मान्यताओं और ‘स्कंद पुराण’ के ‘केदारखंड’ के अनुसार, राहु ने इस स्थान पर भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। मान्यता है कि राहु ने ही इस मंदिर में शिवलिंग की स्थापना की थी। स्थानीय लोगों के अनुसार कहा जाता है कि आद्य शंकराचार्य ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। कहते हैं कि जब शंकराचार्य दक्षिण से हिमालय की यात्रा पर आए तो उन्हें पौड़ी के पैठाणी गांव के इस क्षेत्र में राहु के प्रभाव का आभास हुआ। इसके बाद उन्होंने पैठाणी में राहु के मंदिर का निर्माण शुरू किया।कुछ लोग इसे पांडवों द्वारा निर्मित भी मानते हैं। उत्तराखंड गढ़वाल मंडल के पर्वतीय अंचल में स्थित यह मंदिर बेहद भव्य, अद्भुत एवं खूबसूरत है, जिसके दीदार को देश-दुनिया से पर्वटक एवं श्रद्धालु पैठाणी गांव पहुंचते हैं। यह मंदिर 8वीं-9वीं सदी की प्राचीन वास्तुकला को दर्शाता है। मंदिर में एक प्राचीन शिव लिंग स्थापित है, और यहां भगवान हरिहर की दुर्लभ मूर्ति भी है। राहु मंदिर में श्रद्धालु मूंग की खिचड़ी को प्रसाद के रूप में चढ़ाते हैं। ऐसा माना जाता है कि यह प्रसाद राहु के अशुभ प्रभाव को कम करने में सहायक होता है। मंदिर के मुख्य गर्भगृह के पास ही राहु की एक मूर्ति है, जिसमें उनका कटे हुए सिर का चित्रण किया गया है। पौराणिक कथा के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान राहु ने छल से अमृत का पान कर लिया था, जिसके बाद भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। मंदिर की दीवारों पर अद्भुत नक्काशी की गई है, जिसमें राहु के कटे हुए सिर और भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का चित्रण है। यह मंदिर आज भी भारतीय पुरातत्व विभाग के संरक्षण में है, और यहां की पुरानी वास्तुकला को बिना छेड़छाड़ के संरक्षित किया गया है। पैठाणी गाँव का नाम राहु के गोत्र ‘पैठीनसी’ के नाम पर पड़ा। यह स्थान राठक्षेत्र के नाम से भी जाना जाता है, जो ‘राष्ट्रकूट’ पर्वत से बना है। यही है पैठाणी का राहु मंदिर, जहां राहु की पूजा का एक अनोखा और प्राचीन इतिहास है। यह मंदिर धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, और यहां हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आते हैं। तो अगर आप भी इस अद्भुत स्थल के दर्शन करना चाहते हैं, तो एक बार यहां जरूर आएं।

